नयी दिल्ली, १९ जून; वैशाली के लोगों की ओर से महात्मा बुद्ध को उपहार के रूप में दिया गया भिक्षा पात्र काबुल के नेनल म्यूजियम में रखा गया है और इसे वापस लाने के अब तक के प्रयास असगल रहे हैं. सर्कार अभी भी इसी पसोपेश में है की क्या वास्तव में यह भिक्षा पात्र महात्मा बुद्ध का है या नहीं. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण एएसआई का एक दल दो वर्ष पहले इस बारे में सत्यापन करने काबुल गया था लेकिन अब तक यह इस बारे में कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सका है.
काबुल में रखे गए भिक्षापात्र के बारे में यह मान्यता है कि यह वैशाली के लोगों को भगवान बुद्ध की ओर से दिया गया भिक्षापात्र हो सकता है. पूर्व केंद्रीय मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह ने इस विषय को संसद से लेकर सरकार के विभिन्न स्तरों पर उठाया है और उनकी मांग है कि वैशाली और बौद्ध धर्म के अनुयायियों की आशा आकांक्षा के अनुरूप इसे देश में वापस लाने का केंद्र सरकार प्रयास करें.
श्री सिंह ने बताया कि इस बारे में काबुल गए विशेषज्ञों ने दो अलग -अलग तरह की रिपोर्ट दी जिसके कारण यह समस्या उत्पन्न हुई है. इस विषय को केंद्रीय पर्यटन मंत्री महेश शर्मा के समक्ष भी उठाया है. लेकिन इसका अब तक कोई नतीजा नहीं निकला है. उल्लेखनीय है कि काबुल जाने वाले विशेषज्ञ दल में श्रीकांत मिश्रा और जी एस ख्वाजा शामिल थे .
एएसआई के पहले महानिदेशक सर अलेक्जेंडर कनिंघम की वर्ष 1883 में लिखी गई पुस्तक के 16वें खण्ड में वृति भिक्षापात्र के जैसा ही काबुल का पात्र है. इसकी उंचाई चार मीटर, वजन 350-400 किलोग्राम, मोटाई 18 सेंटीमीटर और 1.75 मीटर गोलाई वाला यह भिक्षापात्र है. डॉ. फिकांत मिश्र ने कुछ समय पहले बताया था कि कुशीनगर में महापरिनिर्वाण के पहले भगवान बुद्ध ने वैशली के लोगों को यह भिक्षापात्र दान में दिया था.
ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, दूसरी शाताब्दी में राजा कनिष्क इसे पुरषपुर (वर्तमान में पेावर) ले गए. इसके बाद इसे गंधार (कंधार) ले जाया गया. फिर 20वीं शाताब्दी में इसे काबुल के म्यूजियम में रखा गया. रघुवंश प्रसाद सिंह ने बताया कि 15वीं लोकसभा से ही वे संसद और बाहर भिक्षापात्र को वैाली लाने की पुरजोर मांग करते आए है. चीनी यात्री फाह्यान और ह्वेनसांग ने भी अपने यात्रावृतांत में इस भिक्षापात्र की चर्चा की है. अगर यह भिक्षापात्र फिर से वैशाली में रखा गया तो वैशाली बौद्धों के लिए सबसे पवित्र स्थानों में से एक हो जाएगा.
पूर्व विदेश मंत्री एस एम कृष्णा ने संसद में एक प्रश्न के लिखित जवाब में कहा था कि अफगानिस्तान में भारतीय उच्चायोग ने बताया है कि भिक्षापात्र अब कंधार में नहीं बल्कि काबुल के संग्रहालय में रखा हुआ है, जिसे अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति नजीबुल्ला के समय में लाया गया था. संस्कृति मंत्रालय ने कहा कि जब तक पुरातत्विक साक्ष्य के साथ प्रमाणित नहीं हो, इसके बारे में कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है. वैशाली के पूर्व सांसद ने कहा कि फाह्यान, ह्वेनसांग, कनिंम, रोमिला थापर जैसे विद्वानों के लेखों एवं पुस्तकों में महात्मा बुद्ध के भिक्षापात्र का उल्लेख है .
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