क्यों पीपल का वृक्ष माना जाता है पवित्र , जानिये इसके पीछे के कारण
पीपल का वृक्ष सबसे पवित्र माना जाता है. मुख्य रूप से इसको भगवान विष्णु का स्वरूप मानते हैं. इसके पत्तों, टहनियों यहां तक कि कोपलों में भी देवी-देवताओं का वास माना जाता है. कहा जाता है कि पीपल के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और शीर्ष में शिव जी निवास करते हैं.
शाखाओं, पत्तों और फलों में सभी देवताओं का निवास होता है. यह प्राकृतिक और आध्यात्मिक रूप से इतना महत्वपूर्ण है कि भगवान कृष्ण गीता में कहते हैं कि, “वृक्षों में मैं पीपल हूं”.
कहाँ है पीपल का मूल स्थान
पीपल के पेड़ का मूल (Origin) भारत भूमि है । यह पेड़ चिरायु है और कई हजार साल तक रहता है । आज मुम्बई में एक पेड़ 3000 वर्ष से अधिक पुराना है । श्रीलंका में एक पेड़ 288 ईसा पूर्व (B.C.) का है, इसे भारत से ले जाया गया था। वह पेड़ आज सबसे पुराना है और उसे पैतृक वृक्ष कहकर उसकी पूजा की जाती है । समुद्र से 5000 फीट (1524 मीटर-) – की ऊँचाई तक पीपल के पेड़ को सहज रूपसे लगाया जा सकता है ।
भारत से यह पेड़ ले जाकर संसार के बहुत सारे मुल्कों में लगाया गया है, जैसे- यूनाइटेड स्टेट्स (United States) साउथ केलीफोर्निया (Southern California) फ्लोरीडा (Florida) हवाई (Hawaii) इजराल (Israel) और संसार के कई ट्रापिकल (Tropical) क्षेत्र । भगवान् बुद्ध ने पीपल के पेड़ के नीचे तपस्या की थी और उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ था। बौद्ध-धर्म के प्राय: सभी मन्दिरों में पीपल का वृक्ष पाया जाता है ।
भगवान कृष्ण ने गीतामें पीपल को अपनी विभूति कहा है। अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणाम् – वृक्षों में पीपल का वृक्ष हूँ । हिन्दुओं में पीपल को जल से सिंचित करना एक धार्मिक कर्म माना जाता है और यह मरणाशौच की निवृत्तिकर पवित्रता प्रदान करता है । पीपल का पेड़ कई प्रकार की औषधियों के निर्माण में काम आता है । एस पेड़ के गुणों से प्रभावित होकर सन् 1987 ई. में भारत सरकार ने इस पर एक विशेष डाक टिकट जारी किया था । आयुर्वेद के अनुसार पीपल मधुर, कषाय और शीतल है । इसके अनुपान- भेदपूर्वक सेवन से कफ, पित्त और दाह नष्ट होते हैं । इसके फलके सेवन से रक्त -पित्त, विष दाह, शोथ एवं अरुचि आदि दूर होते हैं । इस वृक्ष की कोमल छाल एवं पत्ते की कली पुरातन प्रमेह रोग में अत्यन्त लाभप्रद है पीपल के फलका चूर्ण अत्यन्त क्षुधावर्धक है । पीपल के पत्ते की भस्म का शहद के साथ सेवन कफ रोगों में लाभकारी होता है। इसके अतरिक्त अन्य कई व्याधियों संकेत आयुर्वेद में दृष्टिगोचर होता है ।
वैज्ञानिक रूप से पीपल इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह बहुत ऑक्सीजन पैदा करता है।
आज विज्ञान इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि दुनिया का एक मात्र पीपल ही ऐसा वृक्ष है, जो दिन-रात चौबीसों घण्टे ऑक्सीजन का उत्सर्जन करता है तथा कार्बनडाई ऑक्साइड को ग्रहण करता है। इससे बड़ा मानवपकारी कौन हो सकता है ?
इसको ध्यान में रखकर हमें अधिक-से अधिक पीपल के वृक्ष लगाने चाहिए, जिससे हम कार्बनडाई ऑक्साइड के दुष्परिणामों से सुरक्षित रह सकें और जीवनदायिनी ऑक्सीजन से स्वास्थ्य-लाभ एवं दीर्घ आयु प्राप्त कर सकें तथा पर्यावरणको सुधारने में सहयोगी बनें । शास्त्रों में कहा गया है कि पीपल के वृक्ष को बिना प्रयोजन के काटना अपने पितरों को काट देने का समान है । ऐसा करने से वंश की हानि होती है । यज्ञादि पवित्र कार्यों के उद्देश्य से इसकी लकड़ी काटने से कोई दोष न होकर अक्षय स्वर्ग की प्राप्ति होती है पीपल सर्वदेवमय वृक्ष है, अत: इसका पूजन करने से समस्त देवता पूजितो जाते हैं…
छिन्नो येन वृक्षश्वत्थश्छेदिता पितृदेवता: ।
यज्ञार्थं छेदितऽवत्थे ह्यक्षयं स्वर्गमाप्नुयात् ।।
अश्वत्थ: पूजितो यत्र पूजिता: सर्वदेवता:।।
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