आज यानि की 23 नवंबर को आंवला नवमी मनाई जा रही है. आज के दिन आंवले के पेड़ की विधिवत् तरीके से पूजा की जाती है. धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, आंवले के पेड़ में देवों के देव महादेव और भगवान विष्णु वास करते हैं इसलिए इसकी पूजा करने का खास महत्व है. कहा जाता है कि आंवले की पूजा करने से आरोग्य और सुख समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है. वहीं बता दें की कई जगह आंवला नवमी को अक्षय नवमी के नाम से भी जाना जाता है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, आंवला नवमी के दिन पूजा करने और जप-तप, दान करन से कई गुना फल मिलता है.
ऐसे करें आंवला नवमी की पूजा
सबसे पहले प्रातकाल: स्नान करें इसके बाद आंवले के पेड़ की जड़ में दूध अर्पित करें.
इसके बाद रोली, अक्षत, पुष्प चढ़ाएं और दीपक प्रज्वलित करें.
फिर विधिवत रूप से आंवले के पेड़ की पूजा करें और कथा सुने.
पूजा से पहले आंवले के पेंड़ की सफाई करना न भूलें. इसके साथ ही सात बार आंवले पेड़ की परिक्रमा जरूर करें.
इसके बाद परिवार सहित आंवले के पेड़ के नीचे बैठकर भोजन करें. अ
गर आसपास आंवले का पेड़ नहीं है और भोजन नहीं कर पा रहे हैं तो आंवला भी खा सकते हैं.
पूजा मुहूर्त-
आंवला नवमी- 23 नवंबर
नवमी तिथि आंरभ- 22 नवंबर रात 10:52 बजे से 23 नवंबर सोमवार रात 12: 33 बजे तक
पूजा मुहूर्त- सुबह 06: 45 बजे से 11:54 तक
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पौराणिक कथा-
एक राजा था, उसका प्रण था वह रोज सवा मन आंवले दान करके ही खाना खाता था. इससे उसका नाम आंवलया राजा पड़ गया. एक दिन उसके बेटे बहु ने सोचा कि राजा इतने सारे आंवले रोजाना दान करते हैं, इस प्रकार तो एक दिन सारा खजाना खाली हो जायेगा. इसीलिए बेटे ने राजा से कहा की उसे इस तरह दान करना बंद कर देना चाहिए. बेटे की बात सुनकर राजा को बहुत दुःख हुआ और राजा रानी महल छोड़कर बियाबान जंगल में जाकर बैठ गए.
राजा-रानी आंवला दान नहीं कर पाए और प्रण के कारण कुछ खाया नहीं. जब भूखे प्यासे सात दिन हो गए तब भगवान ने सोचा कि यदि मैने इसका प्रण नहीं रखा और इसका सत नहीं रखा तो विश्वास चला जाएगा. इसलिए भगवान ने, जंगल में ही महल, राज्य और बाग-बगीचे सब बना दिए और ढेरों आंवले के पेड़ लगा दिए. सुबह राजा रानी उठे तो देखा की जंगल में उनके राज्य से भी दुगना राज्य बसा हुआ है. राजा, रानी से कहने लगे रानी देख कहते हैं, सत मत छोड़े। सूरमा सत छोड़या पत जाए, सत की छोड़ी लक्ष्मी फेर मिलेगी आए। आओ नहा धोकर आंवले दान करें और भोजन करें. राजा-रानी ने आंवले दान करके खाना खाया और खुशी-खुशी जंगल में रहने लगे. उधर आंवला देवता का अपमान करने व माता-पिता से बुरा व्यवहार करने के कारण बहु बेटे के बुरे दिन आ गए.
राज्य दुश्मनों ने छीन लिया दाने-दाने को मोहताज हो गए और काम ढूंढते हुए अपने पिताजी के राज्य में आ पहुंचे. उनके हालात इतने बिगड़े हुए थे कि पिता ने उन्हें बिना पहचाने हुए काम पर रख लिया. बेटे-बहु सोच भी नहीं सकते कि उनके माता-पिता इतने बड़े राज्य के मालिक भी हो सकते है सो उन्होंने भी अपने माता-पिता को नहीं पहचाना. एक दिन बहु ने सास के बाल गूंथते समय उनकी पीठ पर मस्सा देखा. उसे यह सोचकर रोना आने लगा की ऐसा मस्सा मेरी सास के भी था. हमने ये सोचकर उन्हें आंवले दान करने से रोका था कि हमारा धन नष्ट हो जाएगा. आज वे लोग न जाने कहां होगे ?
यह सोचकर बहु को रोना आने लगा और आंसू टपक टपक कर सास की पीठ पर गिरने लगे. रानी ने तुरंत पलट कर देखा और पूछा कि, तू क्यों रो रही है? उसने बताया आपकी पीठ जैसा मस्सा मेरी सास की पीठ पर भी था. हमने उन्हें आंवले दान करने से मना कर दिया था इसलिए वे घर छोड़कर कहीं चले गए. तब रानी ने उन्हें पहचान लिया. सारा हाल पूछा और अपना हाल बताया. अपने बेटे-बहू को समझाया कि दान करने से धन कम नहीं होता बल्कि बढ़ता है. बेटे-बहु भी अब सुख से राजा-रानी के साथ रहने लगे. हे भगवान, जैसा राजा रानी का सत रखा वैसा सबका सत रखना. कहते-सुनते सारे परिवार का सुख रखना.
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