अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर रिलीजन वर्ल्ड लेकर आया है 21 आधुनिक योगियों कि सीरीज जिसके पहले भागे में आपने जाना था महावतार बाबा के बारे मे. आज के इस भाग में हम आपका परिचय कराएँगे महान योगाचार्य श्याम चरण लाहिड़ी और परमहंस योगानंद से.
श्याम चरण लाहिड़ी

श्यामाचरण लाहिड़ी (30 सितम्बर 1828 – 26 सितम्बर 1895) 18वीं शताब्दी के उच्च कोटि के साधक थे जिन्होंने सद्गृहस्थ के रूप में यौगिक पूर्णता प्राप्त कर ली थी। इन्हें ‘लाहिड़ी महाशय‘ भी कहते हैं। इनकी गीता की आध्यात्मिक व्याख्या आज भी शीर्ष स्थान पर है। इन्होंने वेदान्त, सांख्य, वैशेषिक, योगदर्शन और अनेक संहिताओं की व्याख्या भी प्रकाशित की। इनकी प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि गृहस्थ मनुष्य भी योगाभ्यास द्वारा चिरशांति प्राप्त कर योग के उच्चतम शिखर पर आरूढ़ हो सकता है।
लाहिड़ी महाशय का जन्म बंगाल के नदिया जिले की प्राचीन राजधानी कृष्णनगर के निकट धरणी नामक ग्राम के एक संभ्रान्त ब्राह्मण कुल में अनुमानतः 1825-26 ई. में हुआ था। इनका पठन-पाठन काशी में हुआ। बंगला, संस्कृत के अतिरिक्त इन्होंने अंग्रेजी भी पड़ी यद्यपि कोई परीक्षा नहीं पास की। जीविकोपार्जन के लिए छोटी उम्र में सरकारी नौकरी में लग गए। लाहिड़ी महाशय दानापुर में मिलिटरी एकाउंट्स आफिस में थे। कुछ समय के लिए सरकारी काम से अल्मोड़ा जिले के रानीखेत नामक स्थान पर भेज दिए गए। हिमालय की इस उपत्यका में गुरुप्राप्ति और दीक्षा हुई। इनके तीन प्रमुख शिष्य युक्तेश्वर गिरि, केशवानंद और प्रणवानन्द ने गुरु के सम्बन्ध में प्रकाश डाला है। योगानंद परमहंस ने ‘योगी की आत्मकथा’ नामक जीवनवृत्त में गुरु को बाबा जी कहा है। दीक्षा के बाद भी इन्होंने कई वर्षों तक नौकरी की और इसी समय से गुरु के आज्ञानुसार लोगों को दीक्षा देने लगे थे।
सन् 1880 में पेंशन लेकर लाहिड़ी महाशय काशी आ गए। इनकी गीता की आध्यात्मिक व्याख्या आज भी शीर्ष स्थान पर है। इन्होंने वेदान्त, सांख्य, वैशेषिक, योगदर्शन और अनेक संहिताओं की व्याख्या भी प्रकाशित की। इनकी प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि गृहस्थ मनुष्य भी योगाभ्यास द्वारा चिरशांति प्राप्त कर योग के उच्चतम शिखर पर आरूढ़ हो सकता है। इन्होंने अपने सहज आडम्बर रहित गार्हस्थ्य जीवन से यह प्रमाणित कर दिया था। धर्म के संबंध में बहुत कट्टरता के पक्षपाती न होने पर भी लाहिड़ी महाशय जी प्राचीन रीतिनीति और मर्यादा का पूर्णतया पालन करते थे। शास्त्रों में इनका अटूट विश्वास था।
परमहंस योगानंद

पश्चिम में योग के पिता माने जाने वाले परमहंस योगानंद ने अपना जीवन योग ध्यान की तकनीक का ज्ञान फैलाने में बिताया है- उसी की नींव पर आज अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस खड़ा हुआ है।
ज्ञान की खोज के लिए उनकी व्यक्तिगत इच्छा और उस राह पर चलते हुए उनके संघर्ष ने आज आधुनिक पीढ़ी के लिए योग को सुलभ कराया। आज अनगिनत लोग इस प्राचीन परम्परा का अभ्यास कर रहे हैं।
उनके इस यौगिक सफर का पूरा वृतांत, चुनौतियाँ हो या फिर उपलब्धियां, सभी के बारे में ‘एक योगी की आत्मकथा’ किताब में विस्तार से लिखा गया है। आज भी उनकी किताब साधक, दार्शनिक और योग से जुड़े लोगों के लिए महत्व रखती है। यह भी कहा जाता है कि स्टीव जॉब्स के आईपैड में केवल एक यही किताब मौजूद थी और अपने आखिरी समय में उन्होंने अपने करीबी दोस्तों और रिश्तेदारों को यही किताब अपने आखिरी तोहफ़े के रूप में दी थी।
योगानंद की खोज को परदे पर भी उतारा गया, ‘अवेक: द लाइफ ऑफ़ योगानंद’ डॉक्यूमेंट्री के माध्यम से।
इस डॉक्यूमेंट्री को पुरुस्कृत भी किया गया था। इस डॉक्यूमेंट्री में कुछ सच्ची फुटेज और कुछ पुनृ-कृतियों का मिश्रण किया गया है। इस डॉक्यूमेंट्री में कुछ प्रसिद्द लोगों के साक्षात्कार भी हैं जैसे जॉर्ज हैरिसन (बीटल्स के मुख्य गिटारवादक)। उन्होंने कहा कि वे शायद जीवित नहीं होते अगर उन्होंने योगानंद की किताब को नहीं पढ़ा होता। उनके अलावा सितार विशेषज्ञ रवि शंकर और आधुनिक समय के आध्यात्मिक गुरु दीपक चौपड़ा भी इस फ़िल्म में अपनी प्रतिक्रिया देते नज़र आ रहे हैं।
परमहंस योगानंद का जन्म 5 जनवरी 1893, को गोरखपुर के एक बंगाली परिवार में हुआ। उनका वास्तविक नाम मुकुंद लाल घोष था। अपने आठ भाई-बहनों में वे चौथे थे और बहुत कम उम्र में ही उन्होंने अपनी माँ को खो दिया था। आध्यात्म के बारे में उनके ज्ञान ने किशोरावस्था में ही उनका झुकाव आत्म-प्राप्ति की तरफ कर दिया था। इसके चलते वे कई भारतीय ऋषि-मुनियों में एक गुरु तलाशने लगे जो उन्हें अध्यात्म की खोज में मार्गदर्शित करे।
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साल 1910 में सत्रह साल की उम्र में वे बनारस के श्रद्धेय स्वामी श्री युक्तेश्वर गिरी के शिष्य बन गए। अपने जीवन के दस साल उन्होंने उनके आश्रम में बिताये। आश्रम का माहौल भले ही थोड़ा सख्त था, पर परमहंस योगानंद को उस आध्यात्मिक अनुशासन से प्रेम होने लगा।
कोलकाता यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन के बाद साल 1915 में उन्होंने भारत के मठवासी स्वामी आदेश के अनुसार महंत के रूप में शपथ ली। तभी उन्हें ‘योगानंद’ नाम मिला जिसका अर्थ होता है योग से प्राप्त होने वाला आनंद।
साल 1917 में रांची में भारतीय योगदा सत्संग सोसाइटी की स्थापना करने के बाद साल 1920 में वे अमेरिका चले गए। बोस्टन में इंटरनेशनल कांग्रेस ऑफ़ रिलीजियस लिबरल्स के प्रतिनिधि के रूप में उन्हें आमंत्रित किया गया था।
एक प्रतिभाशाली वक्ता, योगानंद ने ‘द साइंस ऑफ़ रिलिजन’ विषय पर सभा को सम्बोधित किया और उनका सन्देश पूरे अमेरिका में गूंज गया। वह शुरुआत थी पश्चिम में पूर्व के आध्यात्मिक ज्ञान के प्रसार की। उसी साल उन्होंने आत्म-प्राप्ति फैलोशिप की शुरुआत की; जिसके चलते वे भारत के योग का प्राचीन दर्शन और ध्यान के समय-सम्मानित विज्ञान पर अपने ज्ञान को प्रसारित करना चाहते थे।
अगले दशक में उन्होंने नॉर्थ अमेरिका और यूरोप के विभिन्न देशों की यात्रा की और बड़ी-बड़ी सभाओं में लोगों को सम्बोधित किया। उनके भाषणों ने दुनिया के महान धर्मों की अंतर्निहित एकता पर जोर दिया और क्रिया योग की आत्मा जागृति तकनीक की शुरुआत की।
साल 1925 में उन्होंने लॉस एंजिल्स में आत्म-प्राप्ति फैलोशिप के लिए अंतर्राष्ट्रीय मुख्यालय की स्थापना की, जो उनके बढ़ते काम का आध्यात्मिक और प्रशासनिक केंद्र बन गया।
अमेरिका में बिताये वर्षों के दौरान, परमहंस योगानंद ने स्वयं को सभी धर्मों, जातियों और राष्ट्रीयताओं के बीच अधिक सद्भाव और सहयोग को बढ़ावा देने के लिए समर्पित किया। न केवल अपने सार्वजनिक व्याख्यान और कक्षाओं के माध्यम से बल्कि दुनिया भर के देशों में उनके लेखन और केंद्रों के माध्यम से भी उन्होंने दुनिया भर के लाखों लोगों को योग और ध्यान का ज्ञान दिया।
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