कुशीनगर के पडरौना कस्बे के बीचो-बीच 121 सालों से संचालित श्री पिंजरापोल गौशाला सहकारिका और श्वेत क्रांति की नजीर बनती जा रही है। वर्ष 1893 में एक गाय से शुरू इस गौशाला में इस समय 450 गायें हैं।
करीब चार एकड़ क्षेत्र में फैली यह गौशाला हरियाणा नस्ल की विलुप्त हो रही गायों के साथ ही साहीवाल व मैनी नस्ल की दो सौ से अधिक गायों को सहेजे हुए है। अब अपने पैर पर खड़ा होने की जद्दोजहद में इस गौशाला से प्रतिदिन दो सौ लीटर दूध की बिक्री खास तरीके से हो रहा है। एडवांस में उपलब्धता के आधार पर दूध की पर्चियां कटती हैं। साथ ही प्रतिदिन 30 लीटर के करीब दूध बचाकर अब गौशाला के नाम से शुद्ध पेड़ा बनाकर ब्रांडिंग की जा रही है और इस पेड़े की डिमांड अब कोलकाता, मुंबई व दिल्ली सरीखे शहरों में होती जा रही है।
कैसे हुयी गौशाला की शुरुआत
1893 में स्वामी हरिदास नामक साधु पडरौना आए और एक गाय से इस गौशाला की शुरुआत की। उनके प्रयासों को उनके शिष्य रघुवीर दास त्यागी ने बखूबी आगे बढ़ाया और उनके समय में दो एकड़ क्षेत्रफल में फैल चुकी गौशाला में गायों की संख्या 20 हो गई। बाद के दिनों में 1971 के आसपास पडरौना के व्यवसायी नंदलाल चहाड़िया उर्फ भगत जी ने दो एकड़ जमीन खरीद गौशाला के नाम रजिस्ट्री कर दी और फिर मारवाड़ी समाज के लोगों ने एक कमेटी बनाकर गौशाला का प्रबंधन देखना शुरू कर दिया। इस दौरान शहर के प्रतिष्ठित व्यवसायिक घराने खेतान परिवार, टिबड़ेवाल परिवार व लोहिया परिवार के लोग इस प्रबंधन से जुड़ने लगे और गौशाला समृद्ध होती गई।
राज्यपाल की संस्तुति पर गौशाला को मिला सौ एकड़ का चारागाह
20 जुलाई 1954 को तत्कालीन राज्यपाल की संस्तुति से सरकार ने गौशाला के लिए सौ एकड़ का चारागाह दिया। बेलवा जंगल स्थित इस चारागाह में गायों का चारा उगाया जाता है। इसके बाद कमेटी और दानदाताओं के सहयोग से ही गौशाला चल रही है।
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कैसे हुयी गौशाला समृद्ध
पडरौना में मारवाड़ी समाज ने श्याम अतिथि भवन बनवाकर तैयार किया। 11 मार्च-2012 को इसका उद्घाटन था और परंपरा के अनुसार गृह प्रवेश के लिए गौशाला से गाय मंगाई गई। लेकिन इस अवसर पर जो गाय आई वह बहुत बुरी हालत में थी। इस गाय की हालत देख उद्घाटन अवसर पर मौजूद मारवाड़ी समाज के चंद लोगों ने नए सिरे से गौशाला को समृद्ध करने का संकल्प लिया और तब गौशाला में 180 गायें थीं। फिर तब से आज तक गौशाला विकास की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहा है।
गौशाला में ही बढ़ता है गोवंश का परिवार
गौशाला में 410 गायें और 40 के करीब सांड़ हैं। दान की एक-दो गायों को छोड़कर इस गौशाला का परिवार गौशाला में ही बढ़ता है। इस समय भी एक दर्जन से अधिक बछिया व बछड़े गौशाला में कुलाचें भरते हैं।
एक व्यवसायी ने ही बनवा दिया काउ शेड
31 अक्टूबर-2014 को वाराणसी में व्यवसाय करने वाले पडरौना के निवासी भगवान दास चहाड़िया गौशाला भ्रमण करने आए। पता चला कि उनके पिता ने दो एकड़ जमीन दान की थी। उन्हें लगा कि गौशाला में काउ शेड की कमी है। उन्होंने 24 लाख की लागत से काउ शेड व भूसा गोदाम बनवा दिया।
प्रति माह तैयार होता है दो कुंटल खास पेड़ा ( श्री पिंजरापोल गौशाला )
गौशाला से एडवांस पर्ची के आधार पर दूध की बिक्री होती है। गौशाला में ही प्रतिमाह दो कुंटल खास पेड़ा तैयार होता है। कोलकाता, दिल्ली व मुंबई आदि शहरों में पडरौना के रहने वाले परिवार इस पेड़े को मंगाते हैं।
एक दिन में बीस हजार का आता है खर्च श्री पिंजरापोल गौशाला
गायों की देखरेख में प्रतिदिन 20 हजार रुपए का खर्च आता है। अपने संसाधनों से आधा खर्च निकल जाता है, बाकी जरूरतें दानदाताओं व कमेटी के प्रयासों से पूरी की जाती है। पडरौना से बाहर रहने वाले लोग लगातार मदद करते हैं। प्रतिदिन 10 कुंटल भूसा, सात बोरा चोकर, डेढ कुंटल गेहूं का दलिया, 30 किग्रा गुड़, एक कुंटल चूनी व दो ट्राली हरे चारा का खर्च है।
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46 लोग करते हैं गौशाला की नियमित देखरेख
गौशाला में 12 हजार प्रतिमाह से लेकर दो सौ रुपए प्रतिदिन की मजदूरी पर 46 लोग काम करते हैं। नंदकुमार गुप्ता, संतराज, नबी, सहदेव व शिवपूजन आदि की उम्र ही गौशाला में गुजर गई है। इनमें से आठ लोग गौशाला कार्यालय का प्रबंधन देख रहे हैं।
कोर कमेटी की भूमिका है खास
गौशाला की प्रबंध कमेटी भारी-भरकम है। लेकिन गौशाला की नियमित देखरेख के लिए इनमें से कोर कमेटी बनी है। मंत्री प्रदीप चहाड़िया, उप मंत्री संजय मारोदिया, प्रदीप अग्रवाल, अजय सर्राफ, गोपाल शर्मा की दिनचर्या ही इस गौशाला से शुरू होती है।
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